रविवार, 12 अगस्त 2018



❋ श्री रुद्राष्टकम् हिन्दी अनुवादसहित ❋
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्।।१।।
अनुवाद➟ हे मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर, सबके स्वामी भगवान शिवजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात् माया आदि से रहित), गुणों से रहित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करनेवाले दिगम्बर, मैं आपको भजता हूँ (आपका पूजन करता हूँ)।
निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम्।।२।।
अनुवाद➟ निराकार, ओमकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार के परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूत कोटी प्रभा श्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा।।३।।
अनुवाद➟ जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं; जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है; जिनके शीश पर सुन्दर नदी गंगाजी विराजमान हैं; जिनके ललाट पर द्वितीय का चन्द्रमा और कण्ठ में सर्प शोभायमान है।
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामी।।४।।
अनुवाद➟ जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भृकुटी एवं विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं; सिंहचर्म धारण किये हुए मुण्डमाल पहने हैं; सबके प्रिय, सबके नाथ भगवान शंकर का मैं पूजन करता हूँ।
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटीप्रकाशम्।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्।।५।।
अनुवाद➟ प्रचण्ड (रुद्र रूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवाले, (शारीरिक, मानसिक और आध्यत्मिक) तीनों प्रकार के दु:खों का नाश करनेवाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, प्रेम के द्वारा प्राप्त होनेवाले भवानीपति श्री शंकर को मैं भजता हूँ। 
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्दसन्दोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।६।।
अनुवाद➟ कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत (प्रलय) करनेवाले, सज्जनों को सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हरनेवाले प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।
न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्।।७।।
अनुवाद➟ हे पार्वतीपति! जब तक मनुष्य आपके चरणकमलों को नहीं भजता, तब तक उसे न तो इहलोक में, न परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और न ही दुःख-सन्तापों का नाश होता है। अत: हे समस्त जीवों के हृदय में निवास करनेवाले प्रभु! प्रसन्न होइये।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो।।८।।
अनुवाद➟ मैं न तो जप जानता हूँ, न तप और न ही पूजा। हे शम्भू! मैं तो सदा सर्वदा आपको ही नमन करता हूँ। बुढ़ापा और जन्म [मृत्यु] दु:खों से जलाये हुए मुझ दुखी की दुःखों से रक्षा करें। हे भगवान शम्भु! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।
अनुवाद➟ यह रुद्राष्टकम् शंकरजी की स्तुति के लिये है। जो मनुष्य इसे प्रेमभाव पढ़ता है, भगवान शम्भु उस पर प्रसन्न होते हैं।
इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम्।
अनुवाद➟ इस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरुद्राष्टकम् सम्पूर्ण होता है।



❋ श्री रुद्राष्टकम् हिन्दी अनुवादसहित ❋
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्।।१।।
अनुवाद➟ हे मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर, सबके स्वामी भगवान शिवजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात् माया आदि से रहित), गुणों से रहित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करनेवाले दिगम्बर, मैं आपको भजता हूँ (आपका पूजन करता हूँ)।
निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम्।।२।।
अनुवाद➟ निराकार, ओमकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार के परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूत कोटी प्रभा श्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा।।३।।
अनुवाद➟ जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं; जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है; जिनके शीश पर सुन्दर नदी गंगाजी विराजमान हैं; जिनके ललाट पर द्वितीय का चन्द्रमा और कण्ठ में सर्प शोभायमान है।
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामी।।४।।
अनुवाद➟ जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भृकुटी एवं विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं; सिंहचर्म धारण किये हुए मुण्डमाल पहने हैं; सबके प्रिय, सबके नाथ भगवान शंकर का मैं पूजन करता हूँ।
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटीप्रकाशम्।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्।।५।।
अनुवाद➟ प्रचण्ड (रुद्र रूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवाले, (शारीरिक, मानसिक और आध्यत्मिक) तीनों प्रकार के दु:खों का नाश करनेवाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, प्रेम के द्वारा प्राप्त होनेवाले भवानीपति श्री शंकर को मैं भजता हूँ। 
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्दसन्दोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।६।।
अनुवाद➟ कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत (प्रलय) करनेवाले, सज्जनों को सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हरनेवाले प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।
न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्।।७।।
अनुवाद➟ हे पार्वतीपति! जब तक मनुष्य आपके चरणकमलों को नहीं भजता, तब तक उसे न तो इहलोक में, न परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और न ही दुःख-सन्तापों का नाश होता है। अत: हे समस्त जीवों के हृदय में निवास करनेवाले प्रभु! प्रसन्न होइये।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो।।८।।
अनुवाद➟ मैं न तो जप जानता हूँ, न तप और न ही पूजा। हे शम्भू! मैं तो सदा सर्वदा आपको ही नमन करता हूँ। बुढ़ापा और जन्म [मृत्यु] दु:खों से जलाये हुए मुझ दुखी की दुःखों से रक्षा करें। हे भगवान शम्भु! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।
अनुवाद➟ यह रुद्राष्टकम् शंकरजी की स्तुति के लिये है। जो मनुष्य इसे प्रेमभाव पढ़ता है, भगवान शम्भु उस पर प्रसन्न होते हैं।
इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम्।
अनुवाद➟ इस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरुद्राष्टकम् सम्पूर्ण होता है।